अध्याय - 10 विद्धुत धारा
अध्याय - 10
विद्धुत धारा
एकांक समय में प्रवाहित आवेश की दर विद्युत धारा कहलाती है(1)किसी परिपथ में विद्युत का प्रवाह उच्च विभव से निम्न विभव की ओर होता है |
(2) विद्युत धारा की दिशा धन आवेश से ऋण आवेश की ओर होती है |
(3) इलेक्ट्रॉनों की गति धारा के विपरीत दिशा में होती है|
I = Q/t
I = ne/t
जहां e =1.6×10-19 कूलाम
मात्रक = कूलाम/ समय = एंपियर
1 मिली एंपियर = 10-3 एंपियर
एक माइक्रो एंपियर = 10-6 एंपियर
एक एंपियर की परिभाषा
किसी परिपथ के किसी बिंदु से यदि 1 सेकंड में एक कूलाम आवेश गुजरता है तो उस परिपथ में धारा 1 एम्पीयर होगी
किसी विद्युत परिपथ में एकांक धन आवेश को एक बिंदु से दूसरे बिंदु तक ले जाने के लिए किया गया कार्य उन दोनों बिंदुओं के मध्य विभवांतर के बराबर होता है
Va-Vb = W/Q = जूल/ कूलाम = बोल्ट
अनंत से एकांक धन आवेश को किसी बिंदु पर लाने में किया गया कार्य विद्युत विभव कहलाता है |
विभवांतर का मापन बोल्ट मीटर से करते हैं जबकि धारा का मापन मीटर से करते हैं
ओम के अनुसार किसी चालक तार के सिरों के मध्य उत्पन्न विभवांतर उसमें प्रवाहित धारा के समानुपाती होता है |
V=RI
यहां R एक स्थिरांक है जिसे चालक का प्रतिरोध कहते हैं
R = V\I = वाल्ट प्रति एंपियर = ओम
यदि किसी चालक तार में 1 एंपियर धारा प्रवाहित करने पर उसके सिरों के मध्य 1 वोल्ट विभवांतर उत्पन्न होता है तो उस चालक तार का प्रतिरोध एक ओम होता है
ओम के नियम का सत्यापन
ग्राफ
प्रतिरोध का चित्र सहित वर्णन
चालकों में आवेशों के प्रवाह में उत्पन्न बाधा को प्रतिरोध कहते हैं
प्रतिरोध की निर्भरता
(1) प्रतिरोध चालक तार की लंबाई के समानुपाती होता है
(2) प्रतिरोध चालक तार की अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल के व्युत्क्रमानुपाती होता है
(3) पदार्थ की प्रकृति पर
K एक स्थिरंक है जिससे चालक पदार्थ का विशिष्ट प्रतिरोध कहते हैं इसका मात्रक ओम×मीटर होता है
इकाई लंबाई तथा इकाई अनुप्रस्थ काट के क्षेत्रफल वाले तार का प्रतिरोध ही विशिष्ट प्रतिरोध या प्रतिरोधकता कहलाता है
चांदी सोना तांबा व एलुमिनियम में से एलुमिनियम का प्रतिरोध सबसे अधिक जबकि चांदी का प्रतिरोध सबसे कम होता है
चालकता का बढ़ता क्रम
चांदी ) तांबा ) सोना ) एलुमिनियम
प्रतिरोध का संयोजन
श्रेणी क्रम संयोजन
समांतर क्रम संयोजन
विद्युत धारा का तापीय प्रभाव
जब किसी चालक तार में बैटरी द्वारा धारा प्रवाहित की जाती है तो बैटरी की रासायनिक ऊर्जा मुक्त इलेक्ट्रॉनों की गतिज ऊर्जा के रूप में रूपांतरित होती है यह मुक्त इलेक्ट्रॉन चालक के परमाणुओं से टकराते हैं जिससे उनकी गतिज ऊर्जा में क्षय होता है जिसके कारण बैटरी की रासायनिक ऊर्जा चालक में ऊष्मीय ऊर्जा के रूप में परिवर्तित होती रहती हैं |
किसी परिपथ में बैटरी के साथ विशुद्ध प्रतिरोध जोड़ने पर क्रोध की संपूर्ण ऊर्जा का उष्मीय ऊर्जा में परिवर्तित होना विद्युत धारा का तापीय प्रभाव कहलाता है
इस प्रभाव का उपयोग विद्युत हीटर, विद्युत प्रेस, विद्युत गीजर आदि में होता है
विशुद्ध प्रतिरोध में तापीय प्रभाव से उत्पन्न ऊष्मा का मान ज्ञात करना
किसी परिपथ में धारा प्रवाहित करने पर एकांक समय में होने वाला कार्य विद्युत शक्ति कहलाता है
एक किलोवाट
1 मेगावाट
एक अश्व शक्ति
विद्युत धारा का चुंबकीय प्रभाव
ओरेस्टेड का प्रयोग
जब किसी परिपथ में धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक तार के चारों और चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न हो जाता है इसे समझने के लिए एक प्रयोग कर सकते हैं एक परिपथ में चालक तार के पास चुंबकीय सुई रखने पर
(1) जब परिपथ में कोई धारा प्रवाहित नहीं करते हैं मुख्य सुई में कोई विक्षेप नहीं होता है
(2) जब परिपथ में धारा प्रवाहित की जाती है तो चालक तार के पास रखी चुंबकीय सुई में विक्षेप होता है
(3) यदि धारा की दिशा विपरीत कर दे तो चुंबकीय सुई में विक्षेप की दिशा बदल जाती है
चुंबकीय क्षेत्र की दिशा
दक्षिणावर्त पेच का नियम - यदि किसी पेच को पेचकस के द्वारा दक्षिण घुमाया जाए की नोंक धारा बहने की दिशा में चले तथा पेज को घुमाने की दिशा चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करती है
दक्षिण हस्त का नियम - इस नियम के अनुसार धारावाही चालक तार को दाएं हाथ से इस प्रकार पकड़ा जाए कि अंगूठा धारा की दिशा को व्यक्त करें जबकि मुड़ी हुई अंगुलियां चुंबकीय क्षेत्र की दिशा को व्यक्त करें
चुंबकीय क्षेत्र और क्षेत्र रेखाएं - किसी चुंबक के चारों और वह क्षेत्र जहां तक उस चुंबक का प्रभाव महसूस होता है चुंबकीय क्षेत्र कहलाता है
चुंबकीय क्षेत्र को काल्पनिक रेखाओं द्वारा व्यक्त किया जाता है इन्हें क्षेत्र रेखा कहते हैं
चुंबकीय क्षेत्र की दिशा सदैव उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव की ओर होती है
ओरस्टेड के प्रयोग से हमने जाना कि किसी चालक तार में धारा प्रवाहित करने पर चुंबकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है
किसी कुंडली एवं चुंबक के बीच सापेक्ष गति के कारण कुंडली में उत्पन्न विद्युत प्रभाव को विद्युत चुंबकीय प्रेरण कहते हैं
किसी चुंबकीय क्षेत्र में रखे पृष्ठ से गुजरने वाली चुंबकीय बल रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से संबंध चुंबकीय फ्लक्स कहते हैं चुंबकीय फ्लक्स का मात्रक वेबर होता है
विद्युत धारा के प्रकार
प्रत्यावर्ती धारा - ऐसी विद्युत धारा जिसका परिमाण एवं दिशा समय के साथ आवर्त रूप से बदलता रहता है प्रत्यावर्ती धारा कहलाती है
दिष्ट धारा - ऐसी विद्युत धारा जिसका परिमाण एवं दिशा समय के साथ नियत रहता है दिष्ट धारा कहलाती है
विद्युत जनित्र एक ऐसी युक्ति है जो यांत्रिक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलती है
आर्मेचर - यह एक आयताकार लोहे पर लिपटी विधुत रोधी तांबे की कुंडली होती है
क्षेत्र चुंबक - आर्मेचर के दोनों तरफ एक शक्तिशाली चुंबक NS होता है इसके द्वारा उत्पन्न चुंबकीय बल रेखाएं N से S की ओर होती है
सर्पीवलय - आरमेचर (कुंडली) के तार के दोनों सिरे धातु के दो छल्लो S 1 व S 2 से जुड़े रहते हैं तथा आर्मेचर के साथ घूमते हैं इन्हें सर्पी वलय कहते हैं
विभक्त वलय (दिक् परिवर्तक) - विभक्त वलय पीतल के खोखले बेलन को उसकी लंबाई के अनुदिश काटकर बनाया जाता है जिसमें कुंडली का एक सिरा दाए वलय तथा दूसरा सिरा बाए वलय से जुड़ा रहता है
ब्रुश - यह कार्बन या किसी धातु की पत्तियों से बने दो ब्रुश होते हैं जिनका एक सिरा तो वलय से तथा दूसरा सिरा परिपथ से जुड़ा होता है
कार्यप्रणाली
जब आर्मेचर को यांत्रिक ऊर्जा देकर घुमाया जाता है तो कुंडली ABCD से लगातार चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है जिससे कुंडली के सिरों पर प्रेरित धारा बहती है कुंडली का AB सिरा जब ऊपर गति करता है तो बल की दिशा ऊपर की ओर होने के कारण प्रेरित विद्युत धारा A से B की ओर प्रवाहित होती है जिससे परिपथ में धारा B1 से B 2 की ओर प्रवाहित होती है जब कुंडली आधा चक्कर लगाती है उस स्थिति में CD सिरे पर ऊपर की और बल लगता है इस स्थिति में प्रेरित विद्युत धारा C से D की ओर प्रवाहित होती है जिससे परिपथ में धारा B2 से B1 की ओर प्रवाहित होती है अर्थात हर आधे चक्र में धारा की दिशा बदल जाती है इस प्रकार अर्मेचर के पूर्ण चक्र में निश्चित कालांतर के बाद धारा की दिशा बदलती है ऐसी धारा को प्रत्यावर्ती धारा को कहते हैं
दिष्ट धारा जनित्र की कार्यप्रणाली -
जब आर्मेचर को यांत्रिक ऊर्जा देकर घुमाया जाता है तो कुंडली ABCD से लगातार चुंबकीय फ्लक्स में परिवर्तन होता है जिससे कुंडली के सिरों पर प्रेरित धारा बहती है कुंडली का AB सिरा जब ऊपर गति करता है तो बल की दिशा ऊपर की ओर होने के कारण प्रेरित विद्युत धारा A से B की ओर प्रवाहित होती है AB सिरा विभक्त वलय P से जुड़ा होता है इस स्थिति में धारा Q से P की ओर प्रवाहित होती है या B2 से B1 की ओर प्रवाहित होती है कुंडली के आधे चक्र के बाद CD सिरे पर ऊपर की और बल लगता है इस स्थिति में प्रेरित विद्युत धारा C से D की ओर प्रवाहित होती है CD सिरा विभक्त वलय Q से जुड़ा होता है इस स्थिति में धारा P से Q की ओर प्रवाहित होती है या B2 से B1 की ओर प्रवाहित होती है